संघर्ष के बीच संवेदनशीलता, नवाचार और अदम्य प्रशासनिक संकल्प की कहानी : धरुन कुमार एस
चुराचंद्रपुर, मणिपुर को खड़ा किया राष्ट्रीय मानचित्र पर
मणिपुर के चुराचंदपुर के उपायुक्त धरुन कुमार एस उन अधिकारियों में से एक हैं जिनकी असली परीक्षा किसी शांत और सामान्य जिले में नहीं, बल्कि जातीय हिंसा और विस्थापन की पीड़ा से जूझते एक अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र में हुई है। वर्ष 2019 बैच के मणिपुर कैडर के इस आईएएस अधिकारी ने प्रशासन की परिभाषा को एक नई गहराई और एक नया अर्थ दिया है — यह सिद्ध करते हुए कि जब परिस्थितियाँ सबसे कठिन हों, तभी एक सच्चे लोकसेवक की असली पहचान होती है।
तमिलनाडु में 3 जून 1994 को जन्मे धरुन कुमार एस की शैक्षणिक यात्रा विविधता और गहराई दोनों से भरी हुई है। उन्होंने वर्ष 2015 में इरोड स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ रोड एंड ट्रांसपोर्ट टेक्नोलॉजी से विज्ञान में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। तकनीकी शिक्षा से अपनी यात्रा आरंभ करने के बाद उन्होंने वर्ष 2021 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली से लोक प्रबंधन में परास्नातक किया और वर्ष 2022 में राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, नई दिल्ली से विधि में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। अभियांत्रिकी, सार्वजनिक नीति और विधि — तीनों क्षेत्रों की यह त्रिवेणी उनकी प्रशासनिक सोच को एक विशेष बहुआयामी दृष्टि देती है, जो उनके प्रत्येक निर्णय और कार्य में स्पष्ट रूप से झलकती है।
यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा उत्तीर्ण कर मणिपुर कैडर में आने के बाद धरुन कुमार एस ने चुराचंदपुर जिले में ही विभिन्न क्षमताओं में अपनी सेवाएँ दीं। उन्होंने सहायक आयुक्त, खंड विकास अधिकारी लामका तथा लामका दक्षिण और उप-मंडल अधिकारी चुराचंदपुर के रूप में कार्य किया। इन विभिन्न पदों पर रहते हुए उन्होंने जिले की भौगोलिक, सांस्कृतिक और सामाजिक जटिलताओं को बारीकी से समझा। 12 जून 2023 को वे चुराचंदपुर के जिला कलेक्टर एवं उपायुक्त के पद पर नियुक्त हुए — और यह नियुक्ति ऐसे समय हुई जब मणिपुर जातीय हिंसा की भीषण आग में जल रहा था। जो जिला उन्होंने वर्षों से विभिन्न क्षमताओं में सेवा देते हुए गहराई से जाना था, उसी का भार अब उनके कंधों पर था — और उन्होंने यह दायित्व पूरी निष्ठा और साहस के साथ उठाया।
मई 2023 में मणिपुर में भड़की जातीय हिंसा ने चुराचंदपुर जिले को सबसे अधिक प्रभावित किया। हजारों परिवार अपने घर छोड़ने पर मजबूर हुए और राहत शिविरों में शरण लेनी पड़ी। इस असाधारण और हृदयविदारक संकट में धरुन कुमार एस ने जो प्रशासनिक संवेदनशीलता प्रदर्शित की, वह न केवल उल्लेखनीय है बल्कि मणिपुर के प्रशासनिक इतिहास में अभूतपूर्व भी है। वे राज्य के पहले उपायुक्त बने जिन्होंने आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों के राहत शिविर में एक रात बिताई। अतिरिक्त उपायुक्त थांगबोई गांगटे के साथ वे पुराने गेलमोल गाँव के राहत शिविर में रुके, शिविरवासियों के साथ भोजन किया और उन्हें कंबल सहित गर्म वस्त्र वितरित किए। यह कोई सांकेतिक दौरा नहीं था — यह एक संवेदनशील प्रशासक का अपने लोगों के दर्द को सच्चे मन से महसूस करने और उनके साथ खड़े रहने का प्रयास था। शिविरवासियों और स्वयंसेवकों ने इस अप्रत्याशित और मार्मिक भाव-भंगिमा के प्रति गहरी कृतज्ञता व्यक्त की।
इसके साथ ही उन्होंने राहत कार्यों को जिला मुख्यालय की परिधि से आगे बढ़ाते हुए संगाईकोट और सैकोट खंड के दूरदराज के शिविरों तक विस्तारित किया। उनकी सक्रिय देखरेख में जिला प्रशासन ने स्वयंसेवी संगठनों के सहयोग से विभिन्न राहत शिविरों में विस्थापितों को कौशल प्रशिक्षण प्रदान किया, ताकि वे स्वतंत्र रूप से आजीविका अर्जित करने में सक्षम हो सकें। जिले के इक्यासी राहत शिविरों में पंद्रह हजार से भी अधिक विस्थापितों के बीच खेल सामग्री के वितरण से लेकर उनके बच्चों की शिक्षा सुनिश्चित करने तक — हर मोर्चे पर उनकी उपस्थिति और सक्रियता दिखी। हिंसा प्रभावित परिवारों के उन बच्चों को, जिन्होंने विषम परिस्थितियों में भी बोर्ड परीक्षाओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया, सम्मानित करने की पहल यह दर्शाती है कि गहरे संकट के बीच भी उनका प्रशासन भविष्य की उम्मीद की लौ जलाए रखने में विश्वास रखता है।
धरुन कुमार एस की सबसे गौरवशाली उपलब्धियों में से एक वह है जो उन्होंने वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान की। जब हजारों विस्थापित नागरिक अपने मताधिकार से वंचित होने की कगार पर थे, तब जिला निर्वाचन अधिकारी के रूप में उन्होंने अभूतपूर्व प्रयास किए। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि जो लोग हिंसा के कारण अपने घरों से दूर राहत शिविरों में जी रहे थे, वे भी लोकतंत्र के इस महापर्व में अपनी सहभागिता दर्ज करा सकें। मतदाता भागीदारी बढ़ाने और विस्थापितों को मतदान का अवसर दिलाने के इन असाधारण प्रयासों के लिए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें पंद्रहवें राष्ट्रीय मतदाता दिवस के अवसर पर "श्रेष्ठ निर्वाचन प्रचलन पुरस्कार" से सम्मानित किया। यह पुरस्कार इस बात का जीवंत प्रमाण है कि यदि अधिकारी में इच्छाशक्ति और संवेदनशीलता हो, तो संघर्षग्रस्त क्षेत्र में भी लोकतंत्र की जड़ें मजबूती से जमाई जा सकती हैं।
शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी उनके कार्यकाल में उल्लेखनीय प्रगति हुई। उनके प्रशासनिक हस्तक्षेप के कारण स्कूल से विद्यार्थियों के बाहर होने की दर में उल्लेखनीय कमी आई। हेंगलेप में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का उन्नयन और उद्घाटन उनके कार्यकाल की एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि रही, जिससे सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच पहले से कहीं बेहतर हुई।
जनजातीय गौरव दिवस के अवसर पर उन्होंने युवाओं को उन आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों से प्रेरणा लेने का आह्वान किया जो भारत के स्वाधीनता संग्राम में अग्रिम पंक्ति में खड़े थे। भगवान बिरसा मुंडा की डेढ़ सौवीं जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रमों में चित्रकला, निबंध, कविता, प्रश्नोत्तरी और लोकनृत्य जैसी प्रतिस्पर्धाओं के माध्यम से उन्होंने जनजातीय सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित और प्रोत्साहित करने का सार्थक प्रयास किया।
धरुन कुमार एस की प्रशासनिक यात्रा यह सिद्ध करती है कि सच्चा नेतृत्व तब परखा जाता है जब परिस्थितियाँ सबसे विकट हों। एक युवा अभियंता से लोक प्रशासन और विधि के जानकार बनने तक, और फिर एक ऐसे जिले के कप्तान के रूप में जहाँ संघर्ष, विस्थापन और पुनर्निर्माण एक साथ चल रहे हों — यह यात्रा वास्तव में असाधारण है। उनकी संवेदनशीलता, उनका साहस और उनकी जनकेंद्रित सोच यह विश्वास दिलाती है कि संकट के सबसे गहरे अंधेरे में भी प्रशासन मानवता का उजला चेहरा बन सकता है — और यही उनकी सबसे बड़ी और स्थायी पहचान है।