नवाचार, पर्यावरण और जनसशक्तिकरण से नई दिशा देने वाली अधिकारी : हरिचंदना दासरी

हैदराबाद के शिल्पकारों और बुनकरों को दिलाई अंतरराष्ट्रीय पहचान

नवाचार, पर्यावरण और जनसशक्तिकरण से नई दिशा देने वाली अधिकारी : हरिचंदना दासरी

हरिचंदना दासरी भारतीय प्रशासनिक सेवा की उन चुनिंदा अधिकारियों में शामिल हैं जिन्होंने प्रशासन को केवल सरकारी व्यवस्था तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे सामाजिक परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण, महिला सशक्तिकरण और नागरिक सहभागिता का प्रभावी माध्यम बनाया। वर्ष 2010 बैच की तेलंगाना कैडर की इस अधिकारी ने अपने दूरदर्शी नेतृत्व, संवेदनशील सोच और नवाचार आधारित प्रशासनिक शैली से राष्ट्रीय स्तर पर विशिष्ट पहचान बनाई है। वर्तमान में वे हैदराबाद की जिला कलेक्टर के रूप में कार्यरत हैं और राजधानी हैदराबाद में प्रशासनिक सुधारों तथा नागरिक-केंद्रित विकास कार्यों को नई दिशा दे रही हैं।

हरिचंदना दासरी की शैक्षणिक और प्रशासनिक यात्रा अत्यंत प्रेरणादायक रही है। हैदराबाद विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में अध्ययन किया। इसके बाद उन्होंने लंदन की आकर्षक नौकरी छोड़कर भारतीय प्रशासनिक सेवा का मार्ग चुना। उनका मानना रहा है कि प्रशासन केवल शासन चलाने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि समाज के जीवन में स्थायी और सकारात्मक परिवर्तन लाने का माध्यम है।

अपने प्रशासनिक जीवन में उन्होंने विशाखापट्टनम में सहायक कलेक्टर, विजयवाड़ा में उप कलेक्टर, ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम में जोनल कमिश्नर, नारायणपेट और नलगोंडा की जिला कलेक्टर, खाद्य सुरक्षा आयुक्त, आयुष निदेशक, नगर प्रशासन निदेशक तथा राष्ट्रीय निर्माण अकादमी की महानिदेशक जैसे महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। प्रत्येक जिम्मेदारी में उनकी कार्यशैली नवाचार, पारदर्शिता और जमीनी भागीदारी पर आधारित रही।

हैदराबाद में उनकी भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय रही है। एक महानगर के रूप में हैदराबाद तेजी से बढ़ते शहरीकरण, यातायात दबाव, प्रदूषण, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, जल संरक्षण और नागरिक सुविधाओं जैसी अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है। हरिचंदना दासरी ने इन चुनौतियों को केवल प्रशासनिक समस्या के रूप में नहीं देखा, बल्कि उन्हें नागरिक सहभागिता और पर्यावरणीय सुधारों के अवसर में बदला।

ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम में जोनल कमिश्नर के रूप में उन्होंने प्लास्टिक कचरे के पुनर्चक्रण की एक अभिनव पहल शुरू की। इस परियोजना के अंतर्गत प्लास्टिक अपशिष्ट का उपयोग कर पावर टाइल्स और सड़क निर्माण सामग्री तैयार की गई। हजारों वर्गफुट क्षेत्र में इन टाइल्स का उपयोग किया गया। यह पहल केवल स्वच्छता अभियान तक सीमित नहीं रही, बल्कि शहरी ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के एक टिकाऊ मॉडल के रूप में सामने आई। इस प्रयोग ने पर्यावरण संरक्षण और शहरी आधारभूत संरचना विकास के बीच एक नया संतुलन स्थापित किया।

हैदराबाद में उनके नेतृत्व में दुर्गम चेरुवु झील के पुनर्जीवन का कार्य भी व्यापक रूप से चर्चा में रहा। कभी उपेक्षित और प्रदूषित हो चुकी यह झील उनके प्रयासों से एक आधुनिक, स्वच्छ और पर्यावरण-अनुकूल सार्वजनिक स्थल के रूप में विकसित हुई। झील के आसपास हरित क्षेत्र, पैदल पथ, प्रकाश व्यवस्था और पर्यावरणीय संरचना विकसित की गई, जिससे यह स्थान नागरिकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया। यह परियोजना शहरी पर्यावरण संरक्षण और सार्वजनिक उपयोगिता का उत्कृष्ट उदाहरण मानी गई।

हरिचंदना दासरी ने शहरी जीवन में पशु-अनुकूल सार्वजनिक स्थलों की आवश्यकता को भी समझा। उनके नेतृत्व में गाचीबोवली में भारत का पहला प्रमाणित “पेट पार्क” विकसित किया गया। इस पार्क में पालतू पशुओं के लिए विशेष गतिविधि क्षेत्र, जलक्रीड़ा क्षेत्र और अलग-अलग सुरक्षित स्थान बनाए गए। यह पहल आधुनिक शहरी जीवन शैली और नागरिक सुविधाओं के क्षेत्र में एक अभिनव प्रयोग के रूप में देखी गई।

हैदराबाद में जिला कलेक्टर के रूप में उन्होंने प्रशासनिक सेवाओं को अधिक पारदर्शी और नागरिक-अनुकूल बनाने पर विशेष बल दिया है। भूमि प्रबंधन, राजस्व प्रशासन, नागरिक शिकायत निवारण और शहरी समन्वय से जुड़े कार्यों में तकनीक आधारित निगरानी व्यवस्था को मजबूत किया गया। वे नियमित जनसुनवाई और क्षेत्रीय निरीक्षण के माध्यम से प्रशासन को सीधे जनता से जोड़ने का प्रयास करती हैं।

उनकी कार्यशैली का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है—समावेशी विकास। वे मानती हैं कि किसी भी महानगर का वास्तविक विकास तभी संभव है जब समाज का अंतिम व्यक्ति भी विकास की प्रक्रिया से जुड़ सके। इसी सोच के तहत उन्होंने महिला समूहों, शहरी गरीबों, युवाओं और छोटे उद्यमियों को प्रशासनिक योजनाओं से जोड़ने पर बल दिया।

नारायणपेट में शुरू की गई “आरुण्य” पहल का प्रभाव आज भी चर्चा में है। इस मंच के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं, बुनकरों और कारीगरों को राष्ट्रीय बाजार से जोड़ा गया। हथकरघा उत्पाद, हस्तशिल्प और स्थानीय खाद्य उत्पादों को डिजिटल मंच उपलब्ध कराकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती दी गई। यह मॉडल आज शहरी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के बीच समन्वय का प्रेरक उदाहरण माना जाता है।

महिला गरिमा और सार्वजनिक स्वच्छता के क्षेत्र में उनकी “शी टॉयलेट” पहल अत्यंत प्रभावशाली रही। महिलाओं के लिए विशेष मोबाइल शौचालय बस की यह व्यवस्था तेलंगाना की पहली ऐसी पहल थी। इसके अंतर्गत हजारों घरेलू शौचालयों का निर्माण कराया गया और ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों में व्यापक जागरूकता अभियान चलाए गए। इस अभिनव परियोजना को राष्ट्रीय स्तर पर भी सराहना मिली और प्रधानमंत्री उत्कृष्टता पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया।

शिक्षा और डिजिटल सशक्तिकरण के क्षेत्र में भी हरिचंदना दासरी का योगदान उल्लेखनीय है। “अर्ली कोडर्स” कार्यक्रम के माध्यम से सरकारी विद्यालयों के विद्यार्थियों और शिक्षकों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा से जोड़ा गया। प्रोग्रामिंग और डिजिटल शिक्षा की यह पहल ग्रामीण और साधारण पृष्ठभूमि के छात्रों को नई संभावनाओं से जोड़ने का माध्यम बनी।

कोविड महामारी के दौरान उन्होंने “टी-कंसल्ट” नामक टेलीमेडिसिन सेवा की शुरुआत कर दूरदराज क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित की। इस व्यवस्था के माध्यम से ग्रामीण नागरिकों को फोन और वीडियो कॉल के जरिए चिकित्सकीय परामर्श उपलब्ध कराया गया। आयुष चिकित्सकों को भी इससे जोड़कर उन्होंने समग्र स्वास्थ्य मॉडल को बढ़ावा दिया।

वर्तमान में उनकी पोस्टिंग तेलंगाना के श्रम, रोजगार, प्रशिक्षण और कारखाना विभाग में सचिव के पद पर हुई है। एक अधिकारी के तौर पर उनकी प्रशासनिक उपलब्धियों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक मान्यता मिली है। उनकी कार्यशैली यह सिद्ध करती है कि यदि प्रशासन संवेदनशीलता, नवाचार और जनभागीदारी के साथ कार्य करे तो शासन व्यवस्था केवल नीतियों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि समाज में वास्तविक और स्थायी परिवर्तन का माध्यम बन जाती है। पर्यावरण संरक्षण, महिला सशक्तिकरण, डिजिटल शिक्षा, शहरी सुधार और जनकेंद्रित प्रशासन के क्षेत्र में उनके प्रयास आज हैदराबाद ही नहीं, बल्कि पूरे देश के प्रशासनिक तंत्र के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुके हैं।