विकास, नवाचार और जनसरोकारों को समर्पित एक संवेदनशील प्रशासक : दीपेश कुमार
सहरसा, बिहार को बनाया विकास और पर्यटन का मॉडल
दीपेश कुमार भारतीय प्रशासनिक सेवा के उन अनुभवी अधिकारियों में शामिल हैं जिन्होंने अपनी सादगी, शांत स्वभाव और व्यावहारिक कार्यशैली के माध्यम से प्रशासन को अधिक प्रभावी और जनहितकारी बनाने का प्रयास किया है। उनका मानना है कि प्रशासन का उद्देश्य केवल सरकारी योजनाओं को लागू करना नहीं, बल्कि लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाना भी है।
बिहार के अररिया जिले के बथनाहा में जन्मे दीपेश कुमार का बचपन विभिन्न सामाजिक और प्रशासनिक अनुभवों के बीच बीता। उनके पिता सिंचाई विभाग में अधिकारी थे, जिसके कारण परिवार को बिहार और झारखंड के अलग-अलग जिलों में रहना पड़ा। इस दौरान उन्हें विभिन्न क्षेत्रों की सामाजिक परिस्थितियों, ग्रामीण जीवन और प्रशासनिक चुनौतियों को नजदीक से देखने का अवसर मिला।
उन्होंने दिल्ली कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से सिविल इंजीनियरिंग में एम.टेक की डिग्री प्राप्त की और निर्माण कार्यों, इंफ्रास्ट्रक्चर व परियोजना प्रबंधन की अच्छी समझ विकसित की। अपने पेशेवर जीवन में उत्कृष्ट सिविल कार्यों के लिए उन्हें मुख्यमंत्री पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया, जो उनकी तकनीकी दक्षता और कार्यकुशलता को दर्शाता है।
भारतीय प्रशासनिक सेवा में आने से पहले उन्होंने बिहार इंजीनियरिंग सेवा में कार्य किया। इस दौरान उन्होंने सड़क, भवन और अन्य सार्वजनिक परियोजनाओं पर काम किया तथा प्रशासन और शासन के व्यावहारिक पहलुओं को करीब से समझा। वर्ष 2017 बैच के आईएएस अधिकारी बनने के बाद उन्होंने मधुबनी में उप विकास आयुक्त के रूप में कार्यभार संभाला। यहाँ उन्होंने कई विकास योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मधुबनी में सफल कार्यकाल के बाद उन्हें सहरसा का जिलाधिकारी नियुक्त किया गया। वर्तमान में वे सहरसा जिले के समग्र विकास के लिए कार्य कर रहे हैं। सहरसा कोसी नदी के पूर्वी तट पर स्थित कोसी प्रमंडल का मुख्यालय है। यह क्षेत्र लंबे समय से बाढ़ और कमजोर संपर्क व्यवस्था जैसी समस्याओं से प्रभावित रहा है। इन चुनौतियों के बीच दीपेश कुमार ने कई महत्वपूर्ण विकास परियोजनाओं को आगे बढ़ाने का प्रयास किया।
क्षेत्र की संपर्क व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए रेलवे ओवरब्रिज परियोजना की शुरुआत कराई गई। इसके अलावा सहरसा-मधेपुरा और सहरसा-सुपौल सड़क परियोजनाओं में भी तेजी लाई गई। कोसी क्षेत्र में बाढ़ के दौरान पुलों के बह जाने की समस्या लंबे समय से लोगों के लिए परेशानी का कारण रही है। ऐसे में कोसी नदी पर देंगराही पुल निर्माण कार्य की शुरुआत को स्थानीय लोग एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानते हैं, क्योंकि इससे क्षेत्र की आवाजाही और संपर्क व्यवस्था को मजबूती मिलेगी।
शिक्षा के क्षेत्र में भी उन्होंने कई नई पहलें शुरू कीं। सरकारी विद्यालयों में विद्यार्थियों की शैक्षणिक प्रगति की नियमित निगरानी के लिए साप्ताहिक मूल्यांकन परीक्षा की व्यवस्था लागू की गई। साथ ही छात्रों के शारीरिक विकास को ध्यान में रखते हुए विद्यालयों के अंतिम पीरियड को खेलकूद के लिए आरक्षित किया गया। यह पहल इतनी प्रभावी साबित हुई कि बाद में बिहार सरकार ने इसे पूरे राज्य में लागू करने का निर्णय लिया। इससे स्पष्ट होता है कि उनकी सोच केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं है, बल्कि विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास पर केंद्रित है।
महिला सशक्तिकरण और स्वरोजगार को बढ़ावा देना भी उनकी प्राथमिकताओं में शामिल रहा है। जीविका समूहों से जुड़ी महिलाओं के लिए पतरघट, सलखुआ और सिमरी बख्तियारपुर जैसे क्षेत्रों में जीविका वेंडिंग जोन स्थापित किए गए। इन केंद्रों के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को अपने उत्पाद बेचने और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने का अवसर मिला। इसके अलावा सहरसा में मखाना क्लस्टर के विकास के लिए राज्य सरकार द्वारा लगभग 2.34 करोड़ रुपये की स्वीकृति दी गई है, जिससे किसानों और महिलाओं के लिए नए आर्थिक अवसर पैदा होने की संभावना है। महिलाओं को रोजगार से जोड़ने के लिए सिलाई केंद्रों की स्थापना भी की गई।
स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए उन्होंने "कायाकल्प" पहल के तहत अस्पतालों की स्वच्छता, आधारभूत सुविधाओं और बायो-मेडिकल वेस्ट प्रबंधन में सुधार पर विशेष ध्यान दिया। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप सहरसा सदर अस्पताल राज्य के बेहतर अस्पतालों में शामिल हुआ और उसे वित्तीय प्रोत्साहन के साथ राज्य स्तरीय सम्मान भी प्राप्त हुआ। यह उपलब्धि स्वास्थ्य क्षेत्र में प्रशासनिक सुधार का एक महत्वपूर्ण उदाहरण मानी जाती है।
शहरी विकास और पर्यटन के क्षेत्र में भी उनके प्रयास उल्लेखनीय रहे हैं। बिहार सरकार ने सहरसा में मत्स्यगंधा झील और उसके आसपास पर्यटन सुविधाओं के विकास के लिए 98 करोड़ रुपये से अधिक की प्रशासनिक स्वीकृति प्रदान की है। इसे क्षेत्र में पर्यटन की संभावनाओं को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। जिले में कई नए पार्कों का निर्माण कराया गया है। साथ ही 8वीं शताब्दी के प्रसिद्ध दार्शनिक पंडित मंदन मिश्र के जन्मस्थान मंदन धाम के विकास और पुनर्जीवन के लिए भी पहल की गई है।
मंडन धाम ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थल माना जाता है। मान्यता है कि लगभग बारह सौ वर्ष पूर्व यहीं आदि शंकराचार्य और पंडित मंडन मिश्र के बीच प्रसिद्ध शास्त्रार्थ हुआ था। वर्तमान में इस स्थान को एक प्रमुख सांस्कृतिक और धार्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में कार्य किया जा रहा है। इसके अलावा जिला स्टेडियम के आधुनिकीकरण का कार्य भी आगे बढ़ाया गया है ताकि युवाओं को बेहतर खेल सुविधाएँ उपलब्ध हो सकें।
दीपेश कुमार की कार्यशैली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह केवल योजनाओं की घोषणा तक सीमित नहीं रहते, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन पर भी समान रूप से ध्यान देते हैं। उनकी तकनीकी पृष्ठभूमि उन्हें परियोजनाओं की गुणवत्ता, समयबद्धता और परिणामों पर विशेष ध्यान देने में मदद करती है। यही कारण है कि उनके नेतृत्व में कई विकास कार्य अपेक्षाकृत तेज गति से आगे बढ़े हैं।
एक प्रशासनिक अधिकारी के रूप में उनकी पहचान ऐसे अधिकारी की है जो विकास, नवाचार और संवेदनशील प्रशासन के बीच संतुलन बनाकर काम करते हैं। उनका विश्वास है कि प्रशासन का वास्तविक उद्देश्य आम लोगों के जीवन को बेहतर बनाना है। इसी सोच के साथ वे सहरसा को बिहार के एक विकसित और मॉडल जिले के रूप में स्थापित करने के लिए लगातार प्रयासरत हैं। आज वे उन अधिकारियों में गिने जाते हैं जो आधुनिक सोच, तकनीकी समझ और मानवीय दृष्टिकोण के साथ प्रशासन को अधिक प्रभावी और जनोन्मुख बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं।