विकास की नई राह गढ़ते प्रशासनिक नेतृत्व का नाम : दिव्या उमेश मिश्रा :
बालोद, छत्तीसगढ़ में कृषि और उर्जा से फैलाई खुशहाली
दिव्या उमेश मिश्रा छत्तीसगढ़ की उन ऊर्जावान और दूरदर्शी प्रशासनिक अधिकारियों में शामिल हैं जिन्होंने कम समय में विकास को जन-आंदोलन का स्वरूप देकर प्रशासनिक सफलता की नई मिसाल स्थापित की है। वर्ष 2012 बैच की इस आईएएस अधिकारी ने अप्रैल 2025 में बालोद की कलेक्टर एवं जिला दंडाधिकारी का कार्यभार संभालते ही जिले को जल-सुरक्षित, पर्यावरण-अनुकूल, आर्थिक रूप से सशक्त और सामाजिक रूप से जागरूक बनाने का व्यापक अभियान शुरू किया। केवल एक वर्ष के भीतर अप्रैल 2026 तक बालोद राष्ट्रीय स्तर पर एक मॉडल जिले के रूप में पहचाना जाने लगा।
दिव्या उमेश मिश्रा की प्रशासनिक कार्यशैली चार प्रमुख स्तंभों पर आधारित रही—जल संरक्षण, पर्यावरण सुरक्षा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सशक्तिकरण और सामाजिक सुधार। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उन्होंने योजनाओं को सरकारी कार्यक्रमों तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि उन्हें जनभागीदारी के साथ जोड़कर व्यापक सामाजिक अभियान बना दिया।
कार्यभार संभालते ही उन्होंने सबसे पहले जल संकट और गिरते भूजल स्तर पर ध्यान केंद्रित किया। “जल शक्ति जन भागीदारी अभियान” उनके नेतृत्व में बालोद की सबसे बड़ी सफलता बनकर उभरा। 6 सितंबर 2024 से 18 नवंबर 2025 तक चले इस अभियान के दौरान जिले में 1.06 लाख से अधिक जल संरक्षण संरचनाओं का निर्माण किया गया। इनमें लगभग 46 हजार संरचनाएं सीधे जनता की भागीदारी से बनीं। इस व्यापक प्रयास का परिणाम यह हुआ कि जिले में भूजल स्तर औसतन 1 मीटर तक बढ़ गया। बालोद को जोन स्तर पर प्रथम तथा राष्ट्रीय स्तर पर तृतीय स्थान प्राप्त हुआ। इस उपलब्धि पर भारत के राष्ट्रपति द्वारा जिला प्रशासन को विशेष सम्मान प्रदान किया गया।
जल संरक्षण के अगले चरण में उन्होंने पुराने बोरवेलों के रिचार्ज, पारंपरिक जल स्रोतों—कुओं, तालाबों और नालों—के पुनर्जीवन तथा वर्षा जल संचयन को अभियान का मुख्य आधार बनाया। जिले की जीवनरेखा माने जाने वाले तांडुला जलाशय के पुनरुद्धार के लिए आईआईटी भिलाई के साथ साझेदारी की गई। गाद सफाई, खरपतवार हटाने, रिटेनिंग वॉल्स को मजबूत करने और वेटलैंड विकास जैसे कार्यों ने इस परियोजना को वैज्ञानिक आधार दिया। पहले चरण में ही 3 किलोमीटर क्षेत्र का सफल पुनर्जीवन किया गया।
पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में “हरित बालोद अभियान” ने पूरे राज्य का ध्यान आकर्षित किया। इस अभियान को “एक पेड़ मां के नाम” से जोड़ा गया, जिससे लोगों का भावनात्मक जुड़ाव बढ़ा। दिव्या उमेश मिश्रा ने सिंचाई और जल उपयोग के क्षेत्र में भी अभिनव प्रयोग किए। “मिशन ओला सिंचाई” के अंतर्गत मिट्टी के छिद्रित घड़ों से कम लागत वाली ड्रिप सिंचाई प्रणाली विकसित की गई। लगभग 15 हजार घड़ों के माध्यम से पौधों को निरंतर नमी उपलब्ध कराई गई। यह प्रणाली पर्यावरण-अनुकूल होने के साथ-साथ पक्षियों और जानवरों के लिए भी जल स्रोत बन गई।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए उन्होंने फसल विविधीकरण कार्यक्रम पर विशेष बल दिया। धान आधारित खेती के स्थान पर दालें, तिलहन, मक्का और बागवानी को प्रोत्साहित किया गया। लगभग 55,353 हेक्टेयर क्षेत्र इस कार्यक्रम से जुड़ा। इससे किसानों की आय में वृद्धि हुई और जल उपयोग का दबाव भी कम हुआ।
महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में “लखपति दीदी मॉडल” विशेष रूप से सफल रहा। औराटोला गांव को छत्तीसगढ़ का पहला “लखपति दीदी गांव” घोषित किया गया। स्वयं सहायता समूहों को मजबूत कर कृषि, पशुपालन, खाद्य प्रसंस्करण और लघु उद्यमों से जुड़कर महिलाओं ने आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ाए।
कृषि आधारित उद्योगों को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से उन्होंने गन्ना उत्पादन को बढ़ावा दिया। लगभग 500 हेक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्र में गन्ना खेती शुरू कराई गई तथा 1,200 किसानों को हार्वेस्टर, ट्रैक्टर और लोडर जैसी आधुनिक मशीनरी उपलब्ध कराई गई। इससे किसानों की लागत कम हुई और उत्पादन क्षमता बढ़ी।
नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में “प्रोजेक्ट दिनकर” उनकी सबसे दूरदर्शी पहलों में गिना जाता है। इस परियोजना के पहले चरण में 28 गांवों के पंचायत भवनों को पूरी तरह सौर ऊर्जा आधारित बनाया गया। इसके परिणामस्वरूप प्रतिवर्ष लगभग 14 लाख यूनिट बिजली की बचत होने लगी। वर्चुअल नेट मीटरिंग आधारित यह मॉडल राज्य और देश दोनों स्तरों पर एक अभिनव उदाहरण बन गया।
सामाजिक सुधारों में उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि बालोद को “बाल विवाह मुक्त जिला” घोषित करना रही। जिले की 437 पंचायतों और 9 नगरपालिकाओं में शून्य बाल विवाह दर्ज किए गए। यह उपलब्धि केवल प्रशासनिक सख्ती का परिणाम नहीं थी, बल्कि सामुदायिक जागरूकता और जनभागीदारी का प्रभाव भी थी।
कुपोषण से लड़ने के लिए “मिशन गोद पोषण” अभियान शुरू किया गया। पहले चरण में मध्यम और गंभीर कुपोषण से प्रभावित लगभग 15 प्रतिशत बच्चों में सुधार दर्ज किया गया। अगले चरण में 25 प्रतिशत सुधार का लक्ष्य रखा गया। इस अभियान में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, महिला समूहों और पंचायतों की सक्रिय भागीदारी रही।
शिक्षा और युवा विकास के क्षेत्र में उन्होंने “नीट-जेईई आवासीय कोचिंग” कार्यक्रम शुरू किया, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का अवसर मिला। डिजिटल लर्निंग, पुस्तकालय और टेस्ट सीरीज जैसी सुविधाएं छात्रों को उपलब्ध कराई गईं।
“टेक्नोफेस्ट” जैसे आयोजनों के माध्यम से विज्ञान, रोबोटिक्स और नवाचार को बढ़ावा दिया गया। हर वर्ष 250 से अधिक छात्र इसमें भाग लेते हैं। 10 परियोजनाएं राष्ट्रीय स्तर पर चयनित हुईं और धनेली स्कूल को राष्ट्रीय पहचान मिली। इससे ग्रामीण छात्रों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और नवाचार की भावना विकसित हुई।
व्यवहार परिवर्तन आधारित अभियानों ने उनकी प्रशासनिक शैली को और प्रभावशाली बनाया। “नो हेलमेट, नो पेट्रोल” अभियान ने सड़क सुरक्षा को नई मजबूती दी। पेट्रोल पंपों पर हेलमेट के बिना ईंधन न देने की व्यवस्था लागू की गई, जिससे लोगों में सुरक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ी।
उन्होंने 440 सूखे बोरवेलों को रिचार्ज संरचना में परिवर्तित कराया। “जल वाहिनी नेटवर्क” के अंतर्गत 436 महिला समितियों का गठन किया गया। ये समितियां गांव स्तर पर जल संरक्षण की निगरानी और जागरूकता का कार्य करती हैं।
दिव्या उमेश मिश्रा की प्रशासनिक शैली में तकनीक, पर्यावरणीय संवेदनशीलता और जनभागीदारी का अद्भुत संतुलन दिखाई देता है। वह आज केवल एक सफल प्रशासक नहीं, बल्कि संवेदनशील नेतृत्व, हरित विकास और जनसेवा की सशक्त प्रतीक बन चुकी हैं। बालोद में उनके प्रयास आने वाले वर्षों तक विकास और सुशासन के प्रेरणादायी उदाहरण के रूप में याद किए जाएंगे।